क्या एआई के दौर में बढ़ती बेरोजगारी का समाधान 'जॉब गारंटी' हो सकता है?
· GlobeWire Daily Tech Desk · Source: www.theguardian.com

चित्र: www.theguardian.com — Creative Commons
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के तेजी से विकास के साथ ही वैश्विक स्तर पर बड़े पैमाने पर बेरोजगारी की आशंकाएं गहराने लगी हैं। इसी पृष्ठभूमि में, सार्वजनिक नीति और अर्थशास्त्र के हलकों में एक पुरानी नीतिगत अवधारणा 'जॉब गारंटी' (काम की गारंटी) पर नए सिरे से चर्चा तेज हो गई है। द गार्जियन में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, कई प्रभावशाली हस्तियों ने चेतावनी दी है कि AI तकनीक आने वाले वर्षों में कानून, तकनीक और वित्त जैसे श्वेत-पोश (white-collar) पेशों समेत कई क्षेत्रों में नौकरियों को समाप्त कर सकती है।
'जॉब गारंटी' क्या है और इसका इतिहास
जॉब गारंटी एक ऐसा सार्वजनिक नीति विकल्प है, जिसके तहत जो भी व्यक्ति काम करना चाहता है, उसे सरकार या संबंधित निकाय द्वारा एक सार्थक और ठीक-ठाक वेतन वाली नौकरी की गारंटी दी जाती है। इसका उद्देश्य लोगों को बेरोजगारी के वित्तीय और मानसिक नुकसान से बचाना और बुनियादी ढांचे, जलवायु अनुकूलन, बुजुर्गों की देखभाल और बाल देखभाल जैसे सामाजिक कार्यों में श्रम शक्ति का उपयोग करना है।
ऐतिहासिक रूप से, 1948 की मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा (Universal Declaration of Human Rights) के अनुच्छेद 23 में काम के अधिकार और बेरोजगारी से सुरक्षा का उल्लेख है। 1930 के दशक की मंदी के दौरान अमेरिका में फ्रैंकलीन डी. रूजवेल्ट द्वारा शुरू किए गए 'वर्क्स प्रोग्रेस एडमिनिस्ट्रेशन' (WPA) ने लाखों लोगों को सार्वजनिक निर्माण कार्यों में लगाया था। इसके अलावा फ्रांस, भारत और अर्जेंटीना जैसे देशों में भी इस तरह के कार्यक्रमों के विभिन्न रूप अपनाए गए हैं।
एआई और नीतिगत प्रस्ताव
संयुक्त राज्य अमेरिका में इस दिशा में कुछ विधायी प्रयास भी सामने आए हैं। सितंबर में अमेरिकी प्रतिनिधि आयन्ना प्रेस्ली ने एक संघीय जॉब गारंटी के लिए कांग्रेस में फिर से प्रस्ताव रखा, जिसमें न्यूनतम 25 डॉलर प्रति घंटे के वेतन और स्थानीय स्तर पर प्रबंधित नौकरियों की परिकल्पना की गई है। इसके अलावा, प्रतिनिधियों ग्रेग कासर, वैलेरी फूशी और सारा जैकब्स ने एक ऐसा प्रस्ताव भी सुझाया है जिसके तहत बड़ी एआई कंपनियों पर कर लगाकर संघीय जॉब गारंटी को वित्तपोषित किया जा सकता है।
दूसरी ओर, ओहियो के क्लेवलैंड में 'यूनिवर्सल बेसिक empleo' (UBE) नामक एक गैर-लाभकारी संगठन ने निजी क्षेत्र की नौकरियों के वेतन को सब्सिडी देने का एक छोटा पायलट अध्ययन शुरू किया है, ताकि श्रमिकों को उचित वेतन मिल सके और वे सामाजिक सुरक्षा लाभों पर निर्भरता कम कर सकें।
लागत और आर्थिक बहस
जॉब गारंटी की वित्तीय व्यवहार्यता को लेकर अर्थशास्त्रियों और राजनेताओं के बीच मतभेद हैं। कुछ आलोचकों और राजनेताओं का तर्क है कि इस तरह के राष्ट्रव्यापी कार्यक्रमों पर खरबों डॉलर का खर्च आएगा। वहीं, आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्र के प्रोफेसर मैक्स कासी जैसे विशेषज्ञों का मानना है कि इस नीति से बेरोजगारी लाभ और विकलांगता लाभ पर होने वाले खर्च में कमी आती है, साथ ही श्रमिक करों का भुगतान करते हैं जिससे राज्य को अतिरिक्त राजस्व मिलता है।
व्यावहारिक निहितार्थ और पाठकों के लिए जानकारी
- निश्चित तथ्य: एआई के कारण संभावित बेरोजगारी की चिंताओं के बीच अमेरिका और अन्य देशों में नीति निर्माताओं और विचारकों द्वारा 'जॉब गारंटी' को एक संभावित समाधान के रूप में आगे बढ़ाया जा रहा है।
- अनिश्चितताएं: इस बात पर अभी कोई वैश्विक आम सहमति नहीं है कि इतने बड़े पैमाने पर जॉब गारंटी को कैसे वित्तपोषित किया जाए और इसके वास्तविक आर्थिक परिणाम दीर्घकाल में क्या होंगे।
- पाठक क्या सत्यापित कर सकते हैं: पाठक इस विषय पर अधिक जानकारी के लिए 'द गार्जियन' पर मूल रिपोर्ट (https://www.theguardian.com/technology/2026/oct/23/job-guarantee-ai-mass-unemployment) देख सकते हैं और विभिन्न देशों में चल रहे पायलट प्रोजेक्ट्स की आधिकारिक रिपोर्टों का अध्ययन कर सकते हैं।
AI की सहायता से तैयार रिपोर्ट; मूल स्रोत के दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं की गई है।
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