विश्व समाचार

काम बहुत हो रहा है पर हासिल कुछ नहीं: AI एजेंट्स के इस्तेमाल को लेकर उठे सवाल

· GlobeWire Daily World Desk · Source: www.amarujala.com

काम बहुत हो रहा है पर हासिल कुछ नहीं: AI एजेंट्स के इस्तेमाल को लेकर उठे सवाल

चित्र: www.amarujala.com — Creative Commons

यह खबर शेयर करें
मुख्य बातेंआर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का दायरा अब कोडिंग से लेकर रिसर्च और दैनिक कार्यों तक तेजी से फैल रहा है। एआई एजेंट्स की मदद से लोग ऐसे कई काम आसानी से कर रहे हैं जिन्हें पूरा करने में पहले काफी समय लगता था। हालांकि, इन टूल्स के लगातार इस्तेमाल को लेकर अब एक नई बहस छिड़ गई

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का दायरा अब कोडिंग से लेकर रिसर्च और दैनिक कार्यों तक तेजी से फैल रहा है। एआई एजेंट्स की मदद से लोग ऐसे कई काम आसानी से कर रहे हैं जिन्हें पूरा करने में पहले काफी समय लगता था। हालांकि, इन टूल्स के लगातार इस्तेमाल को लेकर अब एक नई बहस छिड़ गई है कि क्या यह सचमुच प्रोडक्टिविटी को बढ़ाता है या सिर्फ व्यस्त रहने का एक भ्रम पैदा करता है।

पूर्व एंथ्रोपिक इंजीनियर के विचार और 'मेनिया' की तुलना

पूर्व एंथ्रोपिक इंजीनियर थारिक शिहिपार ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर एआई एजेंट्स के बढ़ते इस्तेमाल को लेकर अपनी राय साझा की है। उनके अनुसार, कोडिंग एजेंट्स के साथ काम करते समय कई बार ऐसी स्थिति बन जाती है जहाँ यूजर को हर वक्त बहुत ज्यादा काम करने का अहसास होता है। थारिक ने इस स्थिति की तुलना मनोवैज्ञानिक स्थिति 'मेनिया' से की है। उनका कहना है कि इसके साथ काम करते हुए ऐसा लग सकता है कि हर समय काम हो रहा है, लेकिन वास्तव में परिणाम शून्य हो सकते हैं।

मुश्किलों से बचने का 'कोपिंग मैकेनिज्म'

थारिक शिहिपार ने इसके पीछे एक अन्य कारण की ओर भी इशारा किया है। उनका मानना है कि कई बार लोग जीवन की किसी अन्य परेशानी या जिम्मेदारी से बचने के लिए भी लगातार एआई टूल्स में व्यस्त रहते हैं। इसे उन्होंने एक संभावित 'कोपिंग मैकेनिज्म' (मुश्किल परिस्थितियों से निपटने का तरीका) के रूप में देखा है। हालांकि, यह उनका व्यक्तिगत नजरिया है और इससे यह साबित नहीं होता कि सभी यूजर्स ऐसा करते हैं।

अन्य जानकारों के अनुभव और तकनीकी पृष्ठभूमि

थारिक शिहिपार इसी महीने की शुरुआत में एंथ्रोपिक कंपनी से अलग हुए हैं, जहां वे 'क्लॉड कोड' से जुड़े प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहे थे। एआई एजेंट्स के साथ काम करने के इस तरह के अनुभव साझा करने वाले वे अकेले नहीं हैं। 'वाइब कोडिंग' शब्द को लोकप्रिय बनाने वाले आंद्रेज कार्पथी ने भी इस साल की शुरुआत में पॉडकास्ट के दौरान अपने अनुभवों का जिक्र किया था, जिसमें उन्होंने एआई की क्षमताओं को परखने के दौरान अपनी मानसिक स्थिति का हवाला दिया था। इसके अलावा, ओपनएआई के सीईओ सैम ऑल्टमैन द्वारा भी एआई टूल्स की बढ़ती क्षमताओं और कार्यशैली में बदलाव को लेकर टिप्पणियां की जाती रही हैं।

व्यावहारिक निहितार्थ और क्या सत्यापित है

  • पुष्टि किए गए तथ्य: थारिक शिहिपार पूर्व एंथ्रोपिक इंजीनियर हैं, जिन्होंने हाल ही में एआई एजेंट्स के इस्तेमाल को लेकर 'एक्स' पर पोस्ट किया था। आंद्रेज कार्पथी और सैम ऑल्टमैन जैसी हस्तियों ने भी समय-समय पर एआई की क्षमताओं और अपने काम के अनुभवों को साझा किया है।
  • अज्ञात या अनिश्चित: यह केवल कुछ जानकारों का व्यक्तिगत अनुभव और नजरिया है। यह वैज्ञानिक रूप से सिद्ध नहीं है कि एआई एजेंट्स का उपयोग करने वाले हर व्यक्ति को इसी तरह की मानसिक स्थिति का सामना करना पड़ता है।
  • पाठक कैसे करें सत्यापन: पाठक इस विषय से जुड़ी मूल जानकारी और आधिकारिक संदर्भ के लिए अमर उजाला की रिपोर्ट (https://www.amarujala.com/technology/tech-diary/ai-agents-becoming-escape-former-anthropic-engineer-raises-concerns-2026-10-30) तथा संबंधित टेक एक्सपर्ट्स के सोशल मीडिया হ্যান্ডल देख सकते हैं।
मूल स्रोत पढ़ें: काम बहुत हो रहा है पर हासिल कुछ नहीं: AI एजेंट्स के यूज को लेकर बड़ा खुलासा, क्यों इसे मेनिया कह रहे विशेषज्ञ?

AI की सहायता से तैयार रिपोर्ट; मूल स्रोत के दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं की गई है।

लेखक के बारे में

GlobeWire Daily World Desk — प्रकाशित स्रोतों पर आधारित AI-सहायता प्राप्त खबरें।

और पढ़ें