भारत की AI दौड़: डेटा सेंटरों का बढ़ता बुनियादी ढाँचा और संसाधनों के सवाल
· GlobeWire Daily Editorial Desk · Source: navbharattimes.indiatimes.com

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भारत में डेटा सेंटरों का विस्तार और ऊर्जा की खपत
भारत में आधुनिक कंप्यूटिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की बढ़ती माँग के साथ डेटा सेंटरों के निर्माण में तेजी आई है। सरकारी आँकड़ों के अनुसार, देश में डेटा सेंटरों की स्थापित क्षमता 2020 में लगभग 375 मेगावाट थी, जो अगस्त 2026 तक बढ़कर 1.57 गीगावाट हो गई। ऊर्जा, पर्यावरण एवं जल परिषद (CEEW) के अनुमान के मुताबिक, यह क्षमता 2030 तक 4.5 से 6.5 गीगावाट तक पहुँच सकती है।
हालांकि, इस तकनीकी विस्तार के साथ ऊर्जा और पर्यावरण से जुड़े गंभीर सवाल भी सामने आ रहे हैं:
- बिजली की भारी माँग: डेटा सेंटरों को भारी मात्रा में बिजली और निरंतर शीतलन (cooling) की आवश्यकता होती है। अधिकांश बिजली कोयले से बनने के कारण ग्रिड पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।
- जल संसाधन का उपयोग: WRI इंडिया के अध्ययन के अनुसार, देश के आधे से अधिक डेटा सेंटर पहले से ही पानी के संकट वाले क्षेत्रों में स्थित हैं।
- स्थानीय विरोध: महाराष्ट्र के ठाणे और आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम जैसे स्थानों पर प्रस्तावित विशाल डेटा सेंटर परियोजनाओं को लेकर स्थानीय स्तर पर पर्यावरणीय चिंताओं और बुनियादी ढाँचे पर पड़ने वाले दबाव पर सवाल उठाए गए हैं।
नीतिगत दिशा-निर्देश और पर्यावरणीय मंज़ूरी
केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय और नीति आयोग द्वारा समय-समय पर जारी दिशा-निर्देशों में पर्यावरणीय प्रभाव, पानी की खपत और स्थानीय लाभों के आकलन की बात कही गई है। अक्टूबर 2026 में नीति आयोग द्वारा जारी मूल्यांकन ढाँचे में राज्यों से ग्रिड की तैयारी और पर्यावरणीय प्रभावों की समीक्षा करने का सुझाव दिया गया है। इसके बावजूद, जानकारों का मानना है कि इन दिशा-निर्देशों की बाध्यकारिता और ज़मीनी स्तर पर अनुपालन की निगरानी को लेकर स्पष्टता और कड़ाई की आवश्यकता है।
तकनीकी प्रगति बनाम मानवीय उद्देश्य
चर्चा केवल संसाधनों के उपभोग तक सीमित नहीं है, बल्कि इस बात पर भी है कि इन शक्तिशाली साधनों का उपयोग किस मंशा से किया जा रहा है। समकालीन विचारकों का तर्क है कि मशीनों की कार्यकुशलता और कंप्यूटिंग क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ यह सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि इन तकनीकों के पीछे की प्रेरणा क्या है और इनसे समाज को वास्तविक लाभ मिल रहा है या नहीं।
- तकनीकी आत्मनिर्भरता और वैज्ञानिक क्षमता का विकास देश के लिए आवश्यक है।
- रियायतों और सार्वजनिक बुनियादी ढाँचे के उपयोग के बाद जनता को स्पष्ट हिसाब मिलना चाहिए।
- केवल मशीनों की क्षमता पर गर्व करने के बजाय उनके उद्देश्यों की स्वतंत्र जाँच होनी चाहिए।
मूल घोषणा की सत्यता की जाँच कैसे करें
किसी भी डेटा सेंटर परियोजना, सरकारी रियायत या नीतिगत घोषणा की सत्यता की पुष्टि के लिए निम्नलिखित कदम उठाए जा सकते हैं:
- संबंधित मंत्रालयों (पर्यावरण, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय) की आधिकारिक वेबसाइटों पर जारी अधिसूचनाओं की जाँच करें।
- नीति आयोग या संबंधित राज्य सरकारों के आधिकारिक पोर्टल पर प्रकाशित डेटा सेंटर नीतियों और पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) रिपोर्टों का अध्ययन करें।
- स्वतंत्र शोध संगठनों (जैसे CEEW या WRI इंडिया) की रिपोर्टों से ऊर्जा और जल खपत के आँकड़ों का मिलान करें।
AI की सहायता से तैयार रिपोर्ट; मूल स्रोत के दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं की गई है।
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