ब्रिटेन में होम-स्कूलिंग का बढ़ता रुझान और शिक्षा प्रणाली पर उठ रहे सवाल
· GlobeWire Daily Education Desk · Source: www.theguardian.com

चित्र: www.theguardian.com — Creative Commons
ब्रिटेन में हाल के वर्षों में होम-स्कूलिंग (घर पर पढ़ाई) के रुझान में तेजी से वृद्धि देखी गई है। बीबीसी के हालिया आंकड़ों के अनुसार, यूके में होम-स्कूल बच्चों की संख्या में पिछले तीन वर्षों में लगभग 40% की वृद्धि हुई है। शैक्षणिक वर्ष 2016-2017 में लगभग 48,000 बच्चे घर पर शिक्षा प्राप्त कर रहे थे, जबकि 2014-2015 में यह संख्या लगभग 34,000 थी। हालांकि, जानकारों का मानना है कि वास्तविक आंकड़े इससे अधिक हो सकते हैं क्योंकि केंद्रीय स्तर पर इसका पूरा डेटा एकत्र नहीं किया जाता है और जो बच्चे कभी स्कूल नहीं गए, उनका पंजीकरण अनिवार्य नहीं है।
होम-स्कूलिंग के पीछे के मुख्य कारण
विशेषज्ञों और अभिभावकों के अनुसार, पारंपरिक स्कूली शिक्षा से मोहभंग होने के कारण कई परिवार अपने बच्चों को घर पर पढ़ाने का विकल्प चुन रहे हैं। माता-पिता अक्सर बुलिंग (उत्पीड़न), परीक्षा के दबाव, तनाव और विशेष शैक्षणिक आवश्यकताओं (Special Educational Needs) को लेकर चिंता व्यक्त करते हैं। कुछ अभिभावक मानते हैं कि कक्षाओं में अधिक छात्र संख्या और कड़े पाठ्यक्रम के कारण बच्चों का व्यक्तिगत विकास ठीक से नहीं हो पाता है। इसके अलावा, प्रौद्योगिकी में बदलाव और ऑनलाइन संसाधनों की उपलब्धता के कारण घर से पढ़ाई कराना अधिक सुलभ हो गया है।
विनियामक चिंताएं और सरकारी प्रस्ताव
होम-स्कूलिंग की बढ़ती लोकप्रियता के बीच, ब्रिटेन सरकार नियमों को कड़ा करने और स्पष्ट करने पर विचार कर रही है। प्रस्तावित बदलावों में होम-स्कूल किए जाने वाले बच्चों का एक अनिवार्य रजिस्टर तैयार करना और स्थानीय प्राधिकरणों द्वारा निगरानी तथा सहायता को बढ़ाना शामिल है। यह कदम मुख्य रूप से बच्चों के कल्याण से जुड़े मामलों और बिना पंजीकरण के चलने वाले स्कूलों (Unregistered Schools) की बढ़ती संख्या के मद्देनजर उठाया जा रहा है। सरकार उन स्कूलों पर जुर्माना लगाने की भी योजना बना रही है जो 'ऑफ-रोलिंग' जैसी प्रथाओं में शामिल हैं, जहां चुनौतीपूर्ण छात्रों के माता-पिता को परीक्षा से पहले बच्चों को घर पर पढ़ाने के लिए राहु दिखाया जाता है।
व्यावहारिक निहितार्थ और भविष्य की अनिश्चितताएं
होम-स्कूलिंग अपनाने वाले परिवारों के सामने कई व्यावहारिक चुनौतियां भी आती हैं:
- वित्तीय बोझ: माता-पिता को परीक्षाओं की फीस (जैसे जीसीएसई परीक्षा लागत) खुद चुकानी पड़ती है। कई बार एक अभिभावक को नौकरी छोड़कर बच्चों को पढ़ाना पड़ता है, जिससे आय पर असर पड़ता है।
- सामाजिककरण: हालांकि स्थानीय होम-एड ग्रुप्स के माध्यम से बच्चे सामाजिक गतिविधियों में भाग लेते हैं, फिर भी पारंपरिक स्कूल जैसी निरंतर सहकर्मी अंतःक्रिया (peer interaction) हर जगह संभव नहीं होती।
- अनिश्चित आंकड़े और विनियमन: चूंकि केंद्रीय पंजीकरण अनिवार्य नहीं है, इसलिए सभी बच्चों की सही ट्रैकिंग करना और उनकी शैक्षणिक प्रगति का आकलन करना एक चुनौती बनी हुई है।
पाठक मूल तथ्यों और आधिकारिक घोषणाओं की पुष्टि के लिए द गार्डियन के मूल लेख और यूके सरकार के शिक्षा विभाग (Department for Education) के आधिकारिक दिशानिर्देशों का संदर्भ ले सकते हैं।
AI की सहायता से तैयार रिपोर्ट; मूल स्रोत के दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं की गई है।
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