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उच्च शिक्षा में छात्र-शिक्षक अनुपात और रिक्त पदों का विरोधाभास: AISHE रिपोर्ट के मायने

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मुख्य बातेंभारत की उच्च शिक्षा प्रणाली दुनिया में सबसे बड़ी प्रणालियों में से एक है। हाल ही में जुलाई 2026 में जारी ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन (AISHE) 2023-24 के आंकड़ों के अनुसार, देश में लगभग 1,200 विश्वविद्यालय, 50,000 कॉलेज और 15,000 स्टैंडअलोन संस्थान हैं। कुल नामांकन लग

भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली दुनिया में सबसे बड़ी प्रणालियों में से एक है। हाल ही में जुलाई 2026 में जारी ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन (AISHE) 2023-24 के आंकड़ों के अनुसार, देश में लगभग 1,200 विश्वविद्यालय, 50,000 कॉलेज और 15,000 स्टैंडअलोन संस्थान हैं। कुल नामांकन लगभग 4.5 करोड़ छात्रों का है, जिन्हें 17 लाख से अधिक शिक्षकों द्वारा पढ़ाया जाता है। हालांकि कागजों पर छात्र-शिक्षक अनुपात (PTR) संतोषजनक नजर आता है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है।

छात्र-शिक्षक अनुपात और रिक्तियों का गणित

AISHE 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, नियमित शिक्षा मोड में राष्ट्रीय पीटीआर सभी संस्थानों में 22:1, विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में 23:1, और विश्वविद्यालयों और उनके घटक इकाइयों में 19:1 है। नियामक मानदंडों के अनुसार उच्च शिक्षा के लिए वांछित सीमा 15:1 से 25:1 के बीच है। लक्षद्वीप (9:1), पुडुचेरी (10:1), लद्दाख (12:1) और अंडमान और निकोबार द्वीप समूह (13:1) जैसे छोटे क्षेत्रों और दक्षिणी राज्यों में सबसे अच्छे अनुपात दर्ज किए गए हैं। गोवा, केरल और तमिलनाडु में यह अनुपात 14:1 है।

लेकिन यह सकारात्मक तस्वीर तब धुंधली पड़ जाती है जब राज्यों से फैकल्टी के खाली पदों की रिपोर्ट्स सामने आती हैं। तमिलनाडु फेडरेशन ऑफ यूनिवर्सिटीज फैकल्टी एसोसिएशन (TANFUFA) और आरटीआई के आंकड़ों के अनुसार, मद्रास विश्वविद्यालय में 65% स्वीकृत शिक्षण पद खाली पड़े हैं। यही नहीं, राज्य के 21 में से 12 विश्वविद्यालयों में 40% से अधिक पद रिक्त हैं।

व्यापक औसत के पीछे छिपी विसंगतियां

विशेषज्ञों का मानना है कि AISHE के समग्र आंकड़े सरकारी और निजी दोनों संस्थानों को मिलाकर तैयार किए जाते हैं, जिससे वास्तविक स्थिति छिप जाती है।

  • निजी बनाम सरकारी: निजी संस्थानों में संविदा या आउटसोर्स पदों के कारण पर्याप्त शिक्षण स्टाफ होता है, जिससे कुल औसत बेहतर दिखता है।
  • विषय और स्तर की अनदेखी: पीटीआर के ये आंकड़े यह नहीं बताते कि किस विषय या किस स्तर (स्नातक या स्नातकोत्तर) पर क्या स्थिति है।
  • मध्यिका (Median) की मांग: शिक्षाविदों का सुझाव है कि केवल औसत के बजाय मध्यिका का उपयोग किया जाना चाहिए, ताकि चरम मानों से डेटा प्रभावित न हो।

डेटा की सीमाएं और आगे की राह

AISHE का यह डेटा संस्थानों द्वारा ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से स्व-घोषित (self-reported) होता है। हालांकि इसमें बिल्ट-इन वैलिडेशन और जांच प्रक्रिया होती है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह डेटा व्यापक संकेतकों के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि एकदम सटीक माप के रूप में।

पाठक आधिकारिक घोषणा और विस्तृत विवरण के लिए [द हिंदू की मूल रिपोर्ट](https://www.thehindu.com/education/why-student-teacher-ratio-in-heis-looks-healthy-while-faculty-posts-lie-vacant/article71634796.ece) देख सकते हैं।

मूल स्रोत पढ़ें: Why student-teacher ratio in HEIs looks healthy while faculty posts lie vacant - The Hindu

AI की सहायता से तैयार रिपोर्ट; मूल स्रोत के दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं की गई है।

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